36 पुरुष और उनका अधूरा आँगन


 36 पुरुष और उनका अधूरा आँगन


36 पुरुषों के पास मायका नहीं होता। न कोई ऐसा आँगन, जहाँ वे बिना किसी शर्त के लौट सकें। न कोई ऐसी गोद, जो उनके थके हुए सिर को सहला सके और कहे - "थक गए हो न? थोड़ा आराम कर लो..."


वे चलते रहते हैं- निरंतर, अथक। एक पुत्र, एक पति, एक पिता की भूमिका में। उनके कंधों पर जिम्मेदारियों का पहाड़ होता है, पर वे कभी खुद के लिए ठहर नहीं पाते।


पुरुष और उनका "मायका"


एक स्त्री के लिए मायका सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि एक भावना होती है- वह सुरक्षा, वह स्नेह, जहाँ वह अपनी थकान उतार सकती है। लेकिन पुरुष? उनके लिए ऐसा कोई स्थान नहीं होता। बचपन से ही उन्हें सिखाया जाता है- "रोना नहीं है," "कमजोर मत बनो," "तुम्हें ही सब संभालना है।"


वे बड़े होते हैं, परिवार बनाते हैं, सबकी जिम्मेदारियाँ उठाते हैं, लेकिन जब वे थक जाते हैं, तो कहाँ जाते हैं? किसके पास जाकर वे कह सकते हैं- "मैं भी तो थक गया हूँ..."


एक पुरुष की अकेली लड़ाई


समाज पुरुषों से हमेशा "मजबूत" रहने की उम्मीद रखता है। उनकी भावनाओं को अनदेखा कर दिया जाता है। अगर वे दुखी हैं, तो उन्हें "कमजोर" मान लिया जाता है। अगर वे रोते हैं, तो उन पर हँसा जाता है।


पर क्या कभी कोई सोचता है कि जिस पुरुष ने पूरी जिंदगी दूसरों के लिए जिया, उसके लिए कौन जीता है?


वक्त आ गया है बदलाव का


हमें यह समझना होगा कि पुरुष भी इंसान हैं। उन्हें भी प्यार चाहिए, सहारा चाहिए, थकान में एक आँगन चाहिए जहाँ वे बिना शर्म के आराम कर सकें।


अगर आपके जीवन में कोई पुरुष है- पिता, पति, भाई, दोस्त - तो उससे पूछिए, "कैसे हो तुम?" और सच में उसकी बात सुनिए। शायद वह आज तक किसी को अपना दर्द नहीं बता पाया हो।

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