दूरियों की धड़कन और शांति
"बस ख़फ़ा नहीं हूँ..." – जब दूरियाँ शब्द नहीं बोलतीं
कभी-कभी रिश्तों में दूरियाँ इतनी धीमी आवाज़ में आती हैं कि वे कोई शोर नहीं मचातीं, बस चुपचाप सब कुछ बदल देती हैं। ऐसा नहीं है कि गुस्सा है, नाराज़गी है, या कोई झगड़ा हुआ है... बस धीरे-धीरे दिल की धड़कनों में वो तेज़ी नहीं रही, रातों की बातों में वो मिठास नहीं रही।
"हर रात बात करने का मन नहीं करता..."
वो वक़्त याद है जब हर शाम का इंतज़ार रहता था? जब फोन की घंटी बजते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी? पर अब... अब बस एक सन्नाटा है। ना तो उत्सुकता बची है, ना ही वो बेचैनी। शायद ये वक़्त की मार है या फिर दिल का कोई और हिसाब, पर अब रातें अकेली गुज़रने लगी हैं।
"तुम्हें खोने से अब दिल नहीं डरता..."
पहले लगता था कि तुम्हारे बिना सांस लेना भी मुश्किल हो जाएगा, पर अब... अब डर नहीं लगता। शायद ये बेख़ौफ़ी नहीं, बल्कि एक सूनापन है जो अब आदत सा हो गया है। जिस चीज़ से सबसे ज़्यादा डरते थे, वो अब डरावनी नहीं लगती।
"ना बरसात में याद आती हो, ना ख्वाबों में दिखती हो..."
कितनी अजीब बात है... वो बारिश जिसमें तुम्हारी यादें भीगा करती थीं, अब बस पानी के कण बनकर रह जाती है। वो रातें जिनमें तुम ख्वाब बनकर आते थे, अब बिना किसी सपने के गुज़र जाती हैं। शायद यही है जब इंसान दिल से उतार देता है बिना किसी लड़ाई के, बिना किसी शिकायत के।
"बस इतना सा है... मैं ख़फ़ा नहीं हूँ तुमसे"
नाराज़गी तो तब होती जब अभी भी कुछ उम्मीद होती। पर जब दिल बस... "जो होगा, देखा जाएगा" वाली मुद्रा में आ जाता है, तो वहाँ ना गुस्सा बचता है, ना मोहब्बत। बस एक शांत सी समझदारी रह जाती है कि अब सब कुछ वैसा नहीं रहा।
शायद कुछ रिश्ते ऐसे ही खत्म होते हैं बिना आवाज़ के, बिना आँसुओं के। बस एक धीमी सी सुलगन दिल



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